हँसते-खेलते बालकों में भारतीय संस्कार आत्मसात हो, अपने भारतीय होने और अपनी भारतीयता पर गौरव जगे, नयी कलाएं एवं गुण अवगत हो इस हेतु भारी मांग पर भारतीय शिक्षण मंडल का गुरुकुल प्रकल्प यह अल्पकालीन वर्ग आयोजित कर रहा है ।

वर्ग के नामानुसार अन्य अनेक शारीरिक, मानसिक गतिविधियों के साथ ही बालक-बालिकाओं को संस्कृत, योग एवं गीता का अभ्यास कराया जाएगा। सरलता एवं वैज्ञानिकता से संस्कृत संभाषण, शास्त्रोक्त वैज्ञानिक प्राण विद्या द्वारा योगाध्ययन तथा भगवद्गीता का कर्मयोग रहस्य रसपूर्णता से बच्चें ऐसे सीखेंगे कि कभी भूलेंगे नहीं। पालक सदा यह कहते रहते हैं कि उनका बालक बडों को मान-सम्मान नहीं देता, वस्तुओं का मूल्य नहीं करता, अपना कार्य स्वयं नहीं करता। समूह में रहने से बालकों में इस अल्पकाल में अनेक संस्कार बिना विशेष प्रयासों के स्वभावगत होंगे। उन्हें मेहनत, परिश्रम का अभ्यास होगा और बडे आनंद से घर आने के बाद वे अपने काम भी स्वयं करेंगे और आपके कामों में भी हाथ बंटाने लगेंगे यदि आप उन्हें वैसा करने दें।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह सिद्ध हो गया है कि देवभाषा संस्कृत के मनमस्तिष्क पर होनेवाले लाभ अनेक हैं। यह अक्षर ज्ञान का प्रथम सोपान है। संस्कृत समझने-बोलने से वाणी का संस्कार मन पर होता है। यह शुद्ध उच्चारण का संपूर्ण शास्त्र है। संस्कृत समझनेवाला बालक कोई भी भाषा बडी सरलता से सीख लेता है तथा मन पर पवित्र संस्कार सदा के लिए अंकित हो जाते हैं। इस वर्ग में केवल समझना-बोलना नहीं, अपितु संस्कृत में सोचना प्रारंभ करेंगे।

प्राचीन काल से हमारी संस्कृति में योग को विशेष महत्व है। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के पश्चात् पूरे विश्व में इसे एक अनोखी पहचान मिली। किन्तु आधुनिकता की दौड़ में योग का वास्तविक स्वरूप पीछे छूटता गया और इसका व्यापार हो गया। शारीरिक स्वास्थ्य लाभ तो योग का साइड इफेक्ट है, मिलेगा ही। योग का सबसे महत्वपूर्ण लाभ है मानसिक एकाग्रता, जो विद्यार्थी काल में सर्वाधिक आवश्यक है।

भगवदगीता एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जिसमें सभी शास्त्रों का सार है। इसके अध्ययन से व्यक्ति को जीवन के सभी प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होते हैं। महाभारत में युद्धभूमि पर अपने सभी सगे संबंधियों को शत्रुओं के पाले में देखकर ‘इनका वध मैं कैसे करू?’ यह सोच अर्जुन भ्रमित हो जाते हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में जब वे अपने सखा श्रीकृष्ण पर ही अपने लिये योग्य-अयोग्य के निर्णय का भार सौंपकर शिष्यत्व ग्रहण करते हैं तब भगवान अपने विराट रूप के दर्शन देकर अर्जुन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। भगवद्गीता जीवन में सतत योग्य मार्गदर्शन देनेवाले प्रश्नों के सटीक उत्तरों से परिपूर्ण हैं। बच्चों में निर्णय क्षमता (Decision Making) बढाने हेतु गीताध्ययन अत्यावश्यक है।